मंगलवार, 9 जून 2020

viyang-on line kavi sammelan- Rajeev namdeo Rana lidhori Tikamgarh( mp)

आदरणीय,                                 दिनांक-10-6-2020
   
.कवि परिचय-
hindi viyangya By Rajeev Namdeo rana lidhori Tikamgarh
 
नाम         :-राजीव नामदेव ‘‘राना लिधौरी’’       
जन्म     :-15.06.1972 (लिधौरा)
माता-पिताः- श्रीमती मिथलेश,श्री सी.एल.नामदेव
पत्नी एवं संतानः- श्रीमती रजनी नामदेव । कु.आकांक्षा एवं कु. अनुश्रुति
शिक्षा   :-बी.एस.सी.(कृषि),एम.ए.(हिन्दी),पी.जी.डी.सी.ए.(कम्प्यूटर)
विधा    :-कविता,ग़ज़ल,हायकू ,व्यंग्य,क्षणिका,लघुकथा,कहानी एंवं आलेख आदि।
प्रकाशन:-  1.अर्चना (कविता संग्रह,1997)     2.रजनीगंधा (हायकू संग्रह .008)    
         3-नौनी लगे बुदेली’ (विश्व में बुंदेली का पहला हाइकु संग्रह-2010)                
    4.राना का नज़राना (ग़ज़ल संग्रह-2015द्ध 5ण्श्लुक लुक की बीमारी’(बुंदेली व्यंग्य संग्रह-2017द्ध
    6साहित्यिक वट वृक्ष’ (ई बुक) (गद्य व्यंग्य संग्रह-2018 7.‘सृजन’(संपादन) 8.आकांक्षा पत्रिका (संपादन 2002 से अब तकद्ध 9.‘संगम’ (संपादन) 10.अनुरोध (संपादन)
    11.‘नागफनी का शहर (व्यग्ंय संकलन) 12.‘दीपमाला’(उपसंपादन) 13. जज़्बात(उपसंपादन)
    14 ‘श्रोता सुमन’ (उपसंपादन) 15 पं. दुर्गाप्रसाद शर्मा अभिनंदन ग्रंथ (सह संपादन-2016)
    एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगभग दो़ हज़ार रचनाओं का प्रकाशन, कवि-सम्मेलनांें  एवं मुशायरों  में शिर्कत।
अप्रकाशित:- ग्यारह अप्रकाशित संग्रह ।
संपादक:- ‘आंकाक्षा’ पत्रिका (सन् 2006 से आज तक)
प्रसारण :-ई टी.व्ही.,दूरदर्शन,सहारा म.प्र.,आकाशवाणी छतरपुर,केन्द्र से प्रसारण।
सम्मान :-16 प्रदेशांे से 80 साहित्यिक सम्मान प्राप्त। म.प्र. एवं उ.प्र. केे तीन महामहिम राज्यपालों द्वारा सम्मानित।
विशेष  :-अब तक 260 साहित्यिक गोष्ठियों/कवि सम्मेलनो का सफल संयोजन/आयोजन। 70 देशो के ब्लाग पाठक
संप्रति      :-    संपादक- ‘आकांक्षा’ पत्रिका, अध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़ (सन् 2002 से आज तक)
    अध्यक्ष- वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़, महामंत्री- अ.भा.बुन्देलखण्ड साहित्य एवं सस्ंकृति परिषद, टीकमगढ़ 
पता    :-नई चर्च के पीछे,शिवनगर कालौनी,कुंवरपुरा रोड,टीकमगढ़ (म.प्र.)पिनः472001    
मोेबाइल :-    09893520965
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    व्यग्ंय-‘‘बुढ़ापा और आनलाइन कवि सम्मेलन’
                    (राजीव नामदेव ‘‘राना लिधौरी’’)
            जब से यह लाॅकडाउन शुरू हुआ है तक से नए कवियों की संख्या टिड्डीदल की तरह बहुत बढ़ गयी है अब तो सोशल मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति ही अपने आप को कवि समझने लगा है और वो रोज ही कुछ न कुछ धड़क्के से पोस्ट कर रहा है। कुछ तो कट, कापी, पेस्ट में इतने माहिर है कि पता ही नहीं चलता की सबसे पहले पोस्ट किसने डाली थी और असली पोस्ट कौन सी है और इसके जन्मदाता मालिक कौन है जिन्होंने यह पोस्ट डाली थी  एक ही पोस्ट का पोस्टमार्डम करके उसे हजारों लोग पोस्ट कर रहे है और मजेदार बात तो तब होती है कि जिसने सबसे पहले वह पोस्ट की थी वही पोस्ट उसके पास फिर से मेकप होकर ऐसे पेश आती है जैसे नई दुल्हन आ रही हो।
            आजकल जब से कारोना वायरस के कारण लाकडाउन हुआ तभी से देश में बड़े-बड़े कवियों का भी भाव ‘डाउन’ हो गये हैं। पहले वे किसी को घास ही नहीं डालते थे बिना पैसे के कहीं आते-जाते और भूलकर भी मुफ्त में अपनी कविता नहीं सुनाते थे, लेकिन कहते है न कि सबके दिन फिरते है ठीक उसी तरह इनके भी दिन फिर गए या कह सकते है कि इनकेे दिनों पर पानी फिर गया है। ये तो वे ही अच्छी तरह से जान गए है कि अब उनके दाम नहीं रहे वे आम हो गए। अब वे रोज ही सोशल मीडिया पर कहीं भी आने के लिए बिलकुल मुफ्त में आने को तैयार है। लाइव आने के लिए ऐसे गिडगिड़ा रहे हैं कि मानों चार -छः महीने कविता नहीं सुनाऐंगे तो वे कविता सुनाना ही भूल जाएंगे। आज एकदम नए और पुराने सभी एक ही मंच पर खूब डूबते-उतराते दिख रहे है। आज एक मामूली से कवि या प्रकाशन,ग्रुप के फेसबुक पेज पर आने के लिए वरिष्ठ और ख्यातिप्राप्त कवि लार टपकाते फिर रहे है। मैंने एक दिन फेसबुक चलाते हुए देख कि एक ख्यातिप्राप्त कवि किसी साधारण छोटे शहर के मामूली से नौसिखिए कवि के फेसबुक पेज पर आधे घंटे से अपनी लाइव कविताएँ पैल रहे थे और आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसे मात्र दस-बारह लाइक और 20-25 लोग लाइव जुडे़ हुए थे कमेन्ट जरूर पचासक होगें, लेकिन उनकी सख्ंया भी इसलिए बढ़ जाती है कि कुछ अति उत्साही कवि जो अभी-अभी पैदा हुए है, वे उन्हें हर पंक्ति पर वाह-वाह अनेक वार लिख देते है। वे कवि इसी में नहीं भूले समाते कि चलों मुझे इतने सारे कमेन्टस मिले है तो निश्चित है कि इतने तो लोगों ने मुझे सुना ही है अच्छा इसमें भी कुछ लोग बहुत चतुर होते है वे लाइक करके एक-दो कमेन्ट्स करके वहाँ से खिसक लेते हैं।
        आज जिस गति से देश में कोरोना के मरीज फैल रहे है ठीक उसी की दोगुनी गति से रोज आनलाइन कवि सम्मेलन हो रहे हैं। इन आनलाइन कवि सम्मेलनों की भी कुछ किस्में है। जैसे पहले किस्म का ‘आनलाइन कवि सम्मेलन’ वास्तव में आनलाइन ही होता है जिसमें विभिन्न ऐप जैसे जूम, ड्यू, वेबबेवस्क्स,व्हाटस्एप, गूगल आदि और भी रोज नए-नए ऐपों का जन्म हो रहा है इनके माध्यम से आनलाइन में शामिल होकर अपनी आत्मा को तृप्त कर लेते है इस प्रकार के माध्यम से पढ़े लिखे कवियों एवं खासकर अधिकारी, युवावर्ग आदि जो इन विभिन्न माध्यमों को अच्छी तरह चलाने में निपुण हो एवं आधुनिक तकनीक के परम ज्ञानी होते है वे इनका सही उपयोग करके स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हंै, कुठ में आठ कुठ में सोलह तो कुछ में पचास-सौ तक लोग एक साथ आनलाइन बैठकर कविता सुना सकते है, और एक-दूसरे के मुखड़े भी देख सकते है, लेकिन जो बूढ़े हो गए और जो मोबाइल में इतना ज्ञान नहीं रखते वे बेचारे इनके चर्चे सुनकर और दूसरे दिन सामाचार पत्रों के पढ़कर बहुत शर्मिंदा होते है तथा मन ही मन कुढ़ते भी लगते है। कुछ आत्मग्लानि से भर उठते है। उस समय उन्हें अपने वरिष्ठ होने पर भी अपनी दाल नहीं गल पाने का बहुत ही अफसोस होता है, तो वे ‘अंगूर खट्टे है’ मानकर अपने दिल को समझाने की हर बार कोशिश करते रहते है, लेकिन दिल तो पागल है कहाँ मानता है कुछ समय पश्चात फिर परेशान करने लगता है। और ये भी पागल होने की अंति स्टेज पर पहुँच जाते है।
            ऐसे की परेशानी के क्षण में किसी वरिष्ठ कवि ने अपने प्रिय चेला की पहले तो खूब बढ़वाई की, उसकी कविताओं की स्तुति की और उसे भविष्य का बहुत बड़ा कवि बनने का दिवस्वप्न दिखाया जब वह उन सपनों में खो गया तो उसे अपनी उक्त व्यथा को बताया कि हम तो मछली से तड़फ रहे हैं किसी को कविता भी नहीं चुना पा रहे हैं अब तो घर वाले इन लाकडाउन के पचास दिन बाद एक सुर में लामबंद हो गए है वे कहते है कि भले ही आप कितना डाॅट दे लेकिन हम आपकी डाॅट तो सुन सकते है,लकिन हम आपकी कविता नहीं सुन सकते इतने दिनो में कान पक चुके है हमारे। अब हम क्या करे कुछ ऐसा उपाय करो कि हम भी इस आनलाइन कवि सम्मेलन में कविता सुनने और सुनाने का मजा ले सके।
                चेला भी उनका पक्का चेला था वह अपनी झूठी प्रशंसा सुनकर ‘फूलकर गुप्पा’ हो गया। उसने अपना दिमाग लगाया और फिर आनलाइन कविसम्मेलन की एक नयी वेराइटी पैदा कर दी। ‘आनलाइन आडियों कवि सम्मेलन’ नाम दिया गया। जिसमें सभी कवियों की पहले से ही आॅडियो में तीन -चार चार मिनिट की उनकी आवाज में कविताएँ रिकार्ड करके कविताएँ मंगा लेते है और फिर उन्हें घोषित तारीख में व्हाट्सएप पर ग्रुप संचालक एडमिन उन सारे कवियों की एकत्रित आडियो क्लिप को क्रमशः उनके नाम या फोटो डालने के बाद डालते रहता है।
        ठीक उसी तरह जैसे आकाशवाणी में कुछ दिन पहले से ही कार्यक्रम की आॅडियों रिकाडिंग हो जाती है और फिर प्रसारित कर दी जाती है इस नयी व्यवस्था से बुजुर्ग कवियों-शायरों में जैसे जान आ गयी हो, सभी लोग तुरंत कोरोना वायरस की भांति तेजी से सारे देश में विभिन्न गुपों में शामिल हो कर ‘एक्टिव’ होने लगे है और अपनी कविताओं का वायरस फैलाने में दिन-रात एक कर रहे है।
        एक बार ऐसे ही शहर में एक कवि ने पहले किस्म के शुद्ध आनलाइन कवि सम्मेलन की देखादेखी स्वयं कराने की बहुत जोर-शोर से घोषणा अपने विभिन्न माध्यमों से कर दी सभी कवियों को आमंत्रित कर दिया सभी कविबन्धु निर्धारित समय पर उन्होंने पासवर्ड दिया था उसे लिख-लिख आनलाइन कवि सम्मेलन में उनसे जुड़ने के लिए तैयार हुए तो अति उत्साही कवि महोदय एप चलाना ही भूल गए वैसे भी वे इतने एक्सपर्ट नहीं थे,लेकिन मानते स्वयं को बहुत ज्यादा बडे़ वाले थे खैर कविसम्मेलन शुरू होने के निर्धारित समय से एक घंटे तक वे उस एप को चलाने के लिए अपने मोबाइल से छेड़खानी करते रहे लेकिन वह तो मानों किसी प्रेमिका की तरह रूठ ही गया था फिर क्या था सभी जुड़ने वाले कवियों के जब बार-बार मोबाइल आने लगे और जब इनसे कुछ करते नहीं बना तो आखिर में एक घंटे बाद इन्होंने अपने हथियार डाल दिया और कवियों से क्षमा माँगते हुए लाकडाउन और तकनीकी कारणों का बहाना लेते हुए कह दिया कि हम पुनः आपको सूचित करेगे आज ये कवि सम्मेलन स्थगित होता है। सभी आमंत्रित कवियों की उंगली की एक घंटे तक कसरत होने और उँगलियों में दर्द होने के बाद यह सूचना मिलते ही सभी ने उन्हें मन ही मन कम से कम सौ गालियों का प्रसाद चढ़ाते हुए उनके हाथ जोड़े और कहा धन्य है आप। वो तो वे उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे वर्ना कुछ तो उनके चरण पकड़ लेते आप जैसे महापुरूष भी है।
            खैर, एक बार गल्ती हो जाये तो उसे लोग क्षमा कर देते है कि चलो बूढा है गलती तो सबसे हो जाती है, लेकिन फिर कुछ दिन बाद इनकी आत्मा कवि गोष्ठी कराने के लिए तडफ उठी चंूकि ये एक संस्था में अध्यक्ष भी है और फिर सामने वाली अन्य संस्था धड़ाधड़ आनलाइन कवि सम्मेलन करा रही है तो ये कैसे शांत रहते है। अब चूंकि पहली वाले प्रकार की के आनलाइन कवि सम्मेलन कराना इनके बस की बात नहीं थी बहुत बदनामी भी हुई थी इसलिए इन्होंने दूसरे तरह का आनलाइन आॅडियो कवि सम्मेलन कराने के लिए फिर जोर-शोर से घोषणा कर दी अति उत्साह में और स्वयं को बहुत ही होशियार समझने की गलतफहमी पालते हुए एक निश्चित समय पर सभी से आॅडियो क्लिप माँगाये गये।
                 लेकिन कहते है न, कि नकल में भी अकल लगती है, लेकिन इन की कहानी उस कौए जैसी हो गयी जो कि एक चिड़िया के पास घौसला बनाने की कला सीखने गया और बिना कुछ सीखे ही अति उत्साह में चिड़िया से बोला अरे आप रहने दो अब मैं घौंसला स्वयं बना लूंगा। बस तिनके की तो लाने पड़ते है और फिर आज तक वह कभी घांैसला बनाना नहीं सीख पाया। कौआ आज भी अपने अंडे कोयल के घौंसले में चुपके से रख आता है,पर इधर तो कोई घौसलों घुस ही नहीं सकता।
        हम बता रहे थे इस बार फिर अतिउत्साह में बिना किसी ज्ञानी से सलाह लिए बिना आनन फानन में एक संस्था के नाम से एक नया ग्रुप बनाया उसी दिन सुबह जिस दिन कवि सम्मेलन था और मजेदार बात थी कि उसमें आधे कवियों को ही जोड़ पाये, आधे जोड़ना ही भूल गए और फिर उसी मोबाइल नंबर पर सभी के आॅडियो माँगा लिए, कवियों तो जैसे वे उपवासे बैठे हो तुरंत ही अपने-अपने आॅडियो डालने शुरू कर दिये,सभी लोग जो कि जुड़े थे वे भी एक दूसरे के आडियों सुनने लगे और मजा लेने लगे एक कवि को ये माजरा समझ में नहीं आया तो उन्होंने इन्हें मोबाइल करके बताया कि कविराज तुमने इसी मोबाइल नंबर पर सभी से आॅडियों क्यों मँगा लिए, तुम्हें अपने व्यक्तिगत या दूसरे मोबाइल नंबर पर आॅडियो मँगाने चाहिए थे,लेकिन इनकी समझ में कुछ नहीं आया जब तीन-चार कवियों ने यही बात कही तो इन्हें लगा कि कुछ तो गड़बड़ है किसी ज्ञानी से पूछा तो उसने हँसते हुए बतलाया कि आपने गलती तो फिर से इस बार भी कर ही दी है, तब उन्होंने फिर उस ग्रुप की तुरंत सेटिंग बदल कर ओनली एडमिन कर दी तब शेष कवियों कें आॅडियो आने बंद हो गये और फिर ज्ञानी से परम ज्ञान लेकर उसके अनुसार काम किया फिर स्वयं आॅडियो डालकर किसी तरह यह आनलाइन ‘आडियो कवि सम्मेलन’ कराकर ऐसा अनुभव किया जैसे कोई युद्ध जीत लिया हो, या गंगा नहा लिए हो, लेकिन इन दोनों प्रकार के आन लाइन कवि सम्मेलन कराने के किस्से जब अन्य कवियों ने सुना तो बहुत देर तक हँसते रहे और इस कोरोना वायरस के भय के कुछ समय के लिए मुक्त होकर उन्मुक्त होकर मुस्कुराते रहे और मन ही मन सोचते रहे कि कहीं इन्हें भी ‘कवि कोरोना’ वायरस तो नहीं हो गया इसलिए अब लोग इनसे दूर होने लगे है इनसे और इनसे कटने लगे है।
    
              राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
                संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
                अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
                 शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)भारत
                पिन-472001 मोबाइल-9893520965
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गुरुवार, 2 मार्च 2017

kavi sammelan-Bhopal

भोपाल में कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करते राना लिधौरी
दिनांक 26-2-2017 को भोपाल (म.प्र.) के हिन्दी भवन में  आयोजित ‘कवि सम्मेलन’ मे’ राना लिधौरी काव्य पाठ करते हुए-
इस कवि सम्मेलन में श्री पंवार राजस्थानी, (भोपाल), श्री महेन्द्र भट्ट (ग्वालियर), राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी (टीकमगढ़), डाॅ. राज गोस्वामी (दतिया),डाॅ.राधा वल्लभ आचार्य (भोपाल), श्री अनिरूद्ध सिंह सेंगर (गुना) डाॅ. रूखसाना सिद्दीकी (टीकमगढ़), श्री रामसेवक सोनी (अषोक नगर),श्री जगदीष चन्द्र चैरे (खण्डवा), रहीम होषंगाबादी (बीना),डाॅ. षैलेन्द्र चैकड़े (खरगौन),डाॅ. सुरेष रावल (उज्जैन) आदि सहित अनेक कवियों नेे काव्य पाठ किया सभी का आभार कैलाष जायसवाल ने माना।

रिपोर्ट-राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
अध्यक्ष-म.प्र.लेखक संघ टीकमगढ़
kavi sammelan

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

व्यंग्य-‘‘मेरा पहला प्यार’ - राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’

व्यंग्य-‘‘मेरा पहला प्यार’

viyangay
- राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
निःसन्देह तुम्ही मेरा पहला प्यार हो, तुम्हारे ‘अलावा’ बाकी सब ‘छलाबा’ है। ‘‘तुम्हीं मेरी काशी और तुम्हीं मेरी काबा हो’’। मैं शत प्रतिशत भारतीय पति हूँ किसी अन्य से प्यार करने का दुःसाहस मुझ जैसा तुच्छ प्राणी चाहते हुए भी नहीं कर सकते, क्योंकि मैं जहाज के एक पंछी के समान हूँ जिसे अंततः वापिस आना ही पड़ता है।
सच मानो तुम्हीं मेरा पहला और तुम्हीं मेरा आखिरी प्यार भी हो क्योंकि मैंने चोट इतनी गहरी पाई है जिधर देखता हूँ उधर खाई ही खाई है। जब मेरे पहले प्यार का अनुभव ही ऐसा है तो दूसरा कैसा होगा, ये सोचकर तो मेरी रूह काँप जाती है, लेकिन तभी मेरे अंदर से एक व्यंग्य जाग जाता है वह शांति के साथ बाहर आता है जो मुझे असीम शांति दिलाता है। परन्तु तुम्हें मेरा यह ‘शांति सुख’ कहाँ भाता है। तुम सदा क्रांति की बाते करने लगती हों, लेकिन मुझे तो यही शांति, सम्वेदना, भावना, सदभावना, शिल्पी, शैली ही सदा भाती है क्योंकि इसी में तो व्यंग्यकार की आत्मा समाती है।
मुझे तुम्हारा ‘पेन’ की तरह लम्बा आकार ‘स्याही’ की तरह श्याम वर्ण बहुत सुहाता है, क्योंकि श्याम वर्ण तो हमारे ईष्टदेव का भी नाता है। वैसे मुझे तुम्हारा पडौसन की साडी देखकर और उसकी प्रशंसा सुनकर ‘निंदारस’ से ओतप्रोत व्यंग्य के बाण चलाना कामदेव की याद दिलाता है। उस बहाने मुझे भी उस सुंदर कामिनी,कंचन-सी काया वाली पडौसन को कुछ देर घूर लेने मौका मिल जाता है। यानि अपनी आँखे चार करने का सौभाग्य मिल जाता है। जो नए-नए विचारों को जन्म देता है उस बहाने कुछ नया लिखने की थीम मिल जाती है और आशा से तो आसमान टिका है। कभी-कभी विल्ली के भाग्य से छींका भी टूट जाता है।
हे मेरे व्यंग्य की अद्भुद व्यंजना कभी-कभी मुझे रंज (दुःख) करते हुए पडौसन रंजना की याद दिलाता है, लेकिन तुम मुझे तंज (व्ंयग्य) करते हुए गंज (गंजा) कर देने की धमकी यदाकदा देती रहती हो। तुम्हारी ये शैली मुझे किसी ‘आलोचक’ की भांति लगती है। लेकिन आज ‘आ’ की नहीं ‘सा’ की जरूरत है। ‘अ’ मतलब अनावश्यक, अयोग्यता, अराजकता, अपात्र, अभिमान, असहयोग, असम्मान, अनादर, आलोचना,आम, बाग, अनशन, असत्य और असहिष्णुता आदि-आदि।
‘सा’ से मेरा मतलब है- सहिष्णुता, समालोचना, समझ, सहयोग, सदभावना, सम्प्रेषणता, सहज, सारांश, सार, सटीक, सुशील, संवाद, सिफारिस, समाज, सुसराल, साले, साली, ससुराल, शांति, समाधान, और सैकड़ा भर सादर शाल,श्रीफल और सम्मान आदि।
मेरा पहला प्यार पानी, पपीता, प्याज, कविता के पद, डायरी के पन्ने, पुष्प, पराग, प्रयास, पहचान, पहनावा आदि भी हो सकते है लेकिन मेरा पहला प्यार मेरी पर्सनल प्रिय पत्नी ही है ऐसा ‘वो’ मानती है। मैं नहीं। वैसे मेरे दिल भी मानता है। जो कुछ नहीं जानता है और दिल तो पागल होता है। भला एक पागल की बात कौन मानता है,लेकिन सहीतो यह है कि एक साहित्यकार रूपी पति का ‘पहला प्यार किसी परिषद का सम्मान पत्र और पुरस्कार के अलावा भला और क्या हो सकता हैं।
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/ राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
पिनः472001 मोबाइल-9893520965
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शनिवार, 30 जनवरी 2016

‘व्यंग्य कार्यशाला’ में ‘राना लिधौरी’ ने किया जिले का प्रतिनिधित्व date-24-26 jan 2016 pachmari mp











viyang‘व्यंग्य कार्यशाला’ में ‘राना लिधौरी’ ने किया जिले का प्रतिनिधित्व


  टीकमगढ़//‘ म.प्र. शासन संस्कृति विभाग के लिए ‘साहित्य अकादमी’ म.प्र.संस्कृति परिषद एवं ‘म.प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ भोपाल द्वारा होटल ‘द मिस्टी मिडोज रिसोर्ट’ के कान्फ्रेंस हाल में पंचमढ़ी म.प्र.में पहली वार तीन दिवसीय ‘व्यंग्य कार्यशाला’ में आयोजित की गयी, जिसमें प्रसिद्ध साहित्यकार एवं व्यंग्यकार राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ ने टीकमगढ़ जिले का प्रतिनिधित्व किया। इस कार्यशाला में देश के ख्यातिप्राप्त व्यंग्यकार शामिल हुए। कार्यक्रम में डाॅ. ज्ञान चतुर्वेदी भोपाल, सुभाष चन्दर, सुशील सिद्यार्थ व संतोष द्विवेदी दिल्ली, प्रमोद ताम्वर, श्रीकांत आपटे व वी.जी.श्रीवास्तव भोपाल, डाॅ. श्याम संुदर दुवे हटा, जगदीश ज्वलंत व पिलकेन्द्र अरोरा उज्जैन, राकेश द्विवेदी इंदौर, राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ टीकमगढ़, गणेश राय दमोह, कैलाश मंडलेकर खंडवा, राकेश श्रीवास्तव व अमित खरे दतिया, देवेन्द्र सिसोदिया व अनिल अयान सतना, अनुराग द्विवेदी जबलपुर, प्रमोद सोनी गुना आदि 20 ख्यातिप्राप्त व्यंग्यकार शामिल हुए। इस कार्यशाला में डाॅ. ज्ञान चतुर्वेदी ने होमवर्क के रूप में ‘मेरा पहला प्यार’ विषय पर एक नया ताजा व्यंग्य 1000 शब्दों में लिखने को दिया गया जिस पर व्यंग्यकारों द्वारा नये व्यंग्य लिखे गये तथा उस पर समीक्षा भी की गयी। कार्यक्रम के सफल आयोजन पर साहित्य अकादमी के निदेशक श्री आनंद सिन्हा व म.प्र. हिन्दी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री पलाश सुरजन ने सभी व्यंग्यकारों का आभार प्रदर्शन किया।
                राना लिधौरी की इस उपलब्धि पर नगर के साहित्यकारों ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है जिसमें प्रमुख रूप से पं.हरिविष्णु अवस्थी, रामस्वरूप दीक्षित, अजीत श्रीवास्तव, रामगोपाल रैकवार, विजय कुमार मेहरा, परमेश्वरीदास तिवारी,गुलाब सिंह भाऊ, उमाशंकर मिश्र, अमिताभ गोस्वामी, चाँद मोहम्मद आखिर, हाजी ज़फ़रउल्ला खां ‘जफर’,वीरेन्द्र बहादुर खरे, दीनदयाल तिवारी, सियाराम अहिरवार, अभिनंदन जैन, आर.एस.शर्मा, वीरेन्द्र चंसौरिया, पूरन चन्द्र गुप्ता, सीताराम राय, योगेन्द्र तिवारी ‘योगी’, शांतिकुमार जैन, आदि है।

रपट- राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’,
     अध्यक्ष म.प्र.लेखक संघ,टीकमगढ़,
      मोबाइल-9893520965,   

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

व्यग्ंय-‘‘सेल्फी सनकी जी और छपास का रोग’’ -राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’

व्यग्ंय-‘‘सेल्फी सनकी जी और छपास का रोग’’           
 -राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’                 
  व्यंग्य का शीर्षक पढ़कर चांैक गए! कवि ऐसे ही उटपटांग नाम रखते किसी का ‘सनकी’ नाम नही सुना है क्या आपने? पागल तो सुना होगा, सूंड, ऊँट,उजबक, चिरकुट, भोंपू, आदि कवियों के साथ तो मैंने एक ही मंच पर कवि सम्मेलनों में कविताएँ सुनायी हैं। आज युवा पीढ़ी इन्टनेट के जाल में पूरी तरह से फंस चुकी है। पहले कम्प्यूटर फिर लेपटाॅप और अब आई पेड, स्मार्ट मोबाइल में वे सभी सुविधाएँ मौजूद है जो पहले लेपटाप और कम्प्यूटर में हुआ करती थीं। इनके मोह जाल में युवा पीढ़ी तेजी से फँसती जा रही हैं आज भारत में युवाओं के साथ-साथ कुछ बुड़ढ़ों में भी फिर से जवानी चढ़ने लगी हैं। वे भी अपनी जेब में मंँहगा मोबाइल लेकर घूमने लगे है। भले ही उनको ढंग से चलाना आता न हो। मोबाइल इस युग का सबसे उपयोगी साधन और सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला सबसे सस्ता,सरल और सुगम साधन है। इसका उपयोग सही दिशा में किया जाये तो बेहतर है वर्ना इसके गलत उपयोग से पैसें और समय की बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं मिलता है।             आज युवाओं में तेजी से ‘सेल्फी’ अर्थात स्वयं की फोटो अपने द्वारा खींचना फिर उसे फेसबुक,टिबटर,आरकुट,हाइक व वाट्सएप आदि पर सेल्फी डालने की सनक सवार हो गयी है। सनक इतनी तेजी से उस गति से फैल रही है जिस गति से भारत में जनसंख्या और महँगाई बढ़ रही है। यह एक नशा की भाँति लोगों के दिमाग में चढ़ रहा हैं अनेक लोगों की जाने भी जा चुकी है।  
         युवाओं को ‘सेल्फी’ लेने का शौक करना तो कुछ उचित लगता हैं, किन्तु कुछ बुढ्डों को भी अपनी सेल्फी लेने और उसे फेसबुक आदि में डालने का शौक उम्र के साठ साल बाद जब सरकार भी उन्हें रिटायर कर देती है, तब चर्राया है।  वो भी अपनी उम्र के अंतिम पडाव में मोबाइल पर अपने इश्क का इजहार कर रहे है। ऐसा लगता है कि इनकी हरकतों को देखते हुए इनके दिमाग ने भी रिटायमेन्ट ले ली है उन्हें भी अब ‘चढ़़ी जवानी बुढ़ढे नू’ की तर्ज पर अपनी सेल्फी लेकर मोबाइल पर अपलोड करने की सनक इस कदर सवार है, कि वे ये नहीं देखते कि क्या लिख रहे है और क्या पोस्ट कर रहे है। बस अपना थोबडा फेसबुक पर देखने और दिखाने की सनक सवार है। यदि आप गौर से देखेगें तो जिससे दूसरों के प्रति घोर ईष्र्या जलन स्पष्ट दिखाई देती है तथा स्वयं को स्यमंभू सर्वश्रेष्ठ कहने की गलतफहमी ठीक उसी तरह जिस प्रकार  होती है जैसे एक‘ कुएँ के मेंढक’ को होती हैं।      
     दिन भर में कम से कम आठ-दस सेल्फी तो ये सेल्फी सनकी जी महाराज डाल ही देते है। इसी कारण लोग उन्हें ‘सेल्फी सनकी जी’ तो कुछ लोग इन्हें सनकी महाराज भी कहते है, ये इतने बडे वाले है कि अपनी सेल्फी खंींचकर उस पर स्वयं ही कमेंटस डाल देते और कमेंटस भी रोमन लिपि क्योंकि, हिन्दी तो इनको आती नहीं है,इसलिए हिन्दी के कमेंटस को अंगे्रजी रोमन लिख देते है और ये भी नहीं देखते है कि क्या लिख गया है, लिखना कुछ चाहते है और लिख कुछ जाता हैं, लोग कुछ और ही समझ जाते है। ये कभी-कभी ऐसी स्पेलिंग लिख देते है ठीक पढ़नेवाला शर्म से पानी-पानी हो जाता है और कुछ उसे पढकर इनके फे्रंड इतने हँसते है कि इतना तो ‘लाफिंग क्लब’ के सदस्य भी न हँसते होगे। आज जहाँ 16 मेगापिक्सल के कैमरे वाले मोबाइल आने लगे है, वहीं ये सेल्फी सनकी जी बहुत पुराना बाबा आदम के जमाने का मोबाइल जिसका कैमरा मात्र 1.44 मेगा पिक्सल का है। उससे अपनी सेल्फी लेकर उलटी सीधी जैसे भी हो फेसबुक पर डाल देते है और अपनी आत्म प्रंशसा रूपी झूट के सागर में गोते लगाते रहते है और स्वयं को ठीक उस गधे के समान बु़िद्धमान समझने लगते है जो गर्मियों में घास खाते हुए पीछे देखता है तो समझता है कि मेेैंने तो आज पूरा मैदान ही खाकर साफ कर दिया है,लेकिन कहते है कि मूर्खो की कभी भी,कहीं भी कमी नहीं है एक ढूँढ़ों तो हजार मिलते है।  
 एकबार तो इन्होंने गजब ही कर दिया। इसी दुलर्भ मोबाइल से एक धुधंली सी सेल्फी फोटो खींची और उस फोटो को उल्टी ही पोस्ट कर दी, जिसमें उनका सिर नीचे और टाँगें ऊपर थी अब ये इतने तो ज्ञानी थे नहीं कि तुरंत वह पोस्ट हटा देते और फोटो सीधी करके पोस्ट कर देते। वह फोटो अभी भी इनके फेसबुक की दुर्लभ सेल्फी में शुमार है जिसे देख कर लोग अपने-अपने अर्थ निकलाते है और एक दूसरे से विचार विमर्श भी करते है, कुछ तर्क वितर्क भी करते हैं ,कुछ लोग तुंरत ही अपने कमंेट कर देते और कुछ लोग बाद में अपने मित्रों क साथ बैठकर इस फोटो पर एक विचार गोष्ठी ही कर लेते हैं। अरे! भाई, साहित्यकार की फोटो है कोई मामूली आदमी की नहीं, वह भी उसकी जो अपने आप को अतंर्राष्ट्रीय कवि मानने की बहुत कड़ी गलतफहमी में जी रहा है। एक कवि का मानना है कि- क्यों न  इस पर शोध कार्य किया जाए और किसी अभागे मेट्रिक पास कवि को डाॅक्टर लिखने का स्वयंभू अधिकार मिल जाए।            
   अक्सर असली कवि अपनी लिखी कविताएँ ही अपने पोस्ट पर डालता है, लेकिन ये सेल्फी सनकी जी स्वयं को बहुत बड़ा कवि मानते है, लेकिन इनके दिमाग में कविताएँ ठीक नेताओं की तरह ही पाँच साल में आती है, हाँ कभी-कभी अपवाद स्वरूप मध्यावर्ती चुनाव की तरह एकाध वार एक नई कविता का जन्म हो जाता है, वर्ना कविताएँ चार-पाँच साल में एकाध नई कविता ही लिख पाते है। इनकी गिनी चुनी घिसी पिटी वे ही चार-पाँच कविताएँ जो कवि गोष्ठियों व कवि सम्मेलनों में गोल्डनजुबली मना चुकी है तथा कुछ डायमण्ड जुबली की ओर अग्रसर है, इनकी ये कविताएँ सुन-सुनकर लोगो के कान तक पक गए है, लेकिन इन्हंे सुनाने में शर्म नहीं आती,क्योंकि इनके दिमाग में नई कविता नहीं आती है। एक वार एक कवि गोष्ठी में संचालक महोदय ने जैसे ही इनका नाम काव्यपाठ हेतु पुकारा तो शताब्दी ट्रेन की गति से बगल में बैठे एक कवि ने तुरंत कहा कि भइया वो वाली कविता मत सुनाना, बेचारे इतने झेंप गए कि फिर दौवारा जिस कवि गोष्ठी में वे महोदय उपस्थित रहते है वे उस कविता को भूलकर भी नहीं सुनाते है, लेकिन है तो वहीं कुल चार छः जमा पूंजी कि । जब भी कोई नया मेहमान कवि शहर में आता है तो वे पुनः उसी कविता को यह कह कर सुनाते देते है कि ये कविता उन्हें समर्पित कर रहे है।        
     ऐसे में इन्होंने ने एक उपाय सोचा और सेल्फी डालने के साथ-साथ किसी भी फिल्म के गाने की दो लाइने लिख देते है, इतना ही नहीं, ये सेल्फी सनकी जी अपनी फोटो के साथ-साथ अपनी पत्नी की भी फोटो डालते है और उस पर ऐसे-ऐसे कमेंन्टस व पुराने फिल्मों के गीतों की लाइन स्वयं लिख देते है कि पढ़ने वाले को शर्म आ जाती है यहाँ यह शोध का विषय हो सकता है कि उनकी पत्नी को इनकी हरकतों की सनक कि भनक है अथवा नहीं।       
    उस पर भी इनकी सेल्फी डालने की सनक पूरी नही होती, तो ये अपनी पुराने जमाने की लगभग पचास साल पुरानी फोटो भी आज 2015 सन् में रिलीज हुई फिल्म के गानों की लाइन लिखकर डाल देते है और मजे की बात तो यह है कि इन्हें ये होश ही नहीं रहता है कि यह फोटो वे कितनी वार पहले पोस्ट कर चुके है और ये गाना कितनी वार लिख चुके है लिख तो ऐसे देते है जैसे इन्होने की वह गाना स्वयं रचा हो या उस गीतकार की आत्मा इनमें आ गयी हो।          
 सनकी सेल्फी जी को अपनी फोटो खिंचवाने का इस कदर शौक है कि एक बार ये एक कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे जिसमें साहित्यकारों को मंच पर बुलाकर सम्मानित किया जा रहा था मंच थोड़ी ऊँचाई पर था और ये महाशय नीचे से संचालन कर रहे थे फिर भी इनकी आत्मा फोटो खिंचवाने के लिए बार बार मंच पर चढ़कर फोटो खिंचवाने के लिए तडफ उठती थी। जब इन्होंने कम से कम दस वार यही ऊपर नीचे जाने की प्रक्रिया अपनाई तथा इसी भागने की जल्दी में इनके धक्के से माइक नीचे गिर गया तोे सामने दर्शकदीर्घा में बैठे एक सज्जन ने कहा भाई साहब माइक दूसरे को दे दो, तुम वहीं खडे रहो फोटो खिंचवाते रहना।                                                     शर्म तो इनको कभी आती नहीं शर्म तो सुनने, देखने और कहने वाले को  आती  है अब हम इनके वारे में क्या कहे,यदि आप इनसे एक बार मिल लेगे, तो इन्हें कभी नहीं भूल सकते, कसम से ऐसे चिपकू आपने दूसरे न देखे होगे। मैं तो इन पर एक उपन्यास तक लिख सकता हूँ,लेकिन यहाँ तो एक व्यंग्य लिखने की कोशिश कर रहा था। कहाँ तक सफल रहा यह आपके हँसने और मुस्कुराने पर निर्भर करता है।                    वैसे तो प्रत्येक कवि व साहित्यकार को छपास का रोग होता है, किन्तु कुछ टुच्चे कवियों में इसके कीटाणु अत्याधिक मात्रा में पाये जाते हैं। ऐसे छपास रोगी कवि प्रायः हर शहर हर गाँव में आपको दो-चार की संख्या में तो देखने को मिल ही जाऐंगे। ऐसे ही हमारे शहर के एक कवि महोदय को इस ‘छपास रोग’ इस कदर लग गया कि पूछों मत।   

         वे हर कवि गोष्ठी में आ ही जाते थे बस किसी प्रकार से पता भर चल जाये और कवि सम्मेलन में तो जुगाड़ कर धंस ही जाते थे और फ्री सेवा में अपने स्थानीय शहर तो शहर ,बाहर तक के शहरों तक में अपने वाहन सहित निःशुल्क उपलब्ध हो जाते थे। उसके बाद उन्हें छपास कीडा़ काटने लगता था और दूसरे दिन उन्हें अपना नाम समाचार पत्रों में पढ़ने का बेहद जनून पागलपन की हद तक सवार था। कभी-कभी तो कवि सम्मेलन चल ही रहा होता है और ये अपनी कविता सुनाकर उसे तुरंत ही अपने मोबाइल से केवल सामने वाले के हाथ पाँव जोड़ के अपनी फोटो खिंचवाकर उसे फेसबुक पर उधर बैठे बैठे केवल अपनी महिमा पंिडत करते हुए फोटो डाल देते है मानों पूरे कवि सम्मेलन में केवल इन्होंने ही कविता पढ़ी हों, और तो और कार्यक्रम में कौन मुख्य अतिथि है किसने,अध्यक्षता की है इससे इनको कोई मतबल नहीं, उनका नाम तक नहीं देते है और बेचारे आयोजक-संयोजक महोदय का भी आभार प्रकट करना तो दूर उसका नाम तक नहीं देते है केवल आत्म प्रशंसा अपनी कविता की चार लाइने लिख देते है और पूरे समाचार की .......कर देते है।            कुल जमा पंूजी की अपनी वे ही दो-चार घिसीपपिटी कविता घुमाफिरा कर सुनाते और उन्हीं में से दो लाइने समाचार पत्रों में छपने को दे देते। ये वही लाइनें होती थीं जो गोल्डन जुबली,डायमंड जुबली मना चुकी होती है। अन्य साथी कवि तो ठीक है,समाचार लिखनेवाले पत्रकारों तक को वे लाइने कंठस्थ याद हो गयी थी, इसीलिए वे इनकी लाइने यदि उस दिन पेपर में जगह खाली रही तो छाप देते थे, वर्ना उनकी लाइनों को केवल पढ़कर की उन्हें प्रणाम करके मुक्ति दे देते थे और उनके स्थान पर दूसरे कवि की कविता की लाइनें छाप देते है।             जिस दिन समाचार में उनकी लाइने आ गयी तब तो ठीक है वर्ना उस आयोजक व संयोजक की शामत आ जाती थी ये महोदय सुबह पेपर पढ़ते ही जब अपनी लाइनें नहीं देखते तो आगबबूला हो जाते और तुरंत मोबाइल से कवि गोष्ठी के संयोजक महोदय को ऐसे फटकारते जैसे इन्होंने उस कार्यक्रम के लिए मानों बहुत कुछ चंदा दिया हो वो भी सपने में क्योकि हकीकत में तो ये ‘चमड़ी जाये पर दमडी न जाये’ उक्ति के परम भक्त हैं मजाल है कि कोई इनसे कार्यक्रम के नाम से एक रूपए भी प्राप्त कर सकें। हाँ,कुछ संस्थाओं की वार्षिक सदस्यता शुल्क देने पर इन्हें बहुत अधिक अंदरूनी कष्ट पहँुचता था ,लेकिन ये देना उनकी मजबूरी थी वर्ना वार्षिक कार्यक्रम व कवि सम्मेलन इनकी दाल न गलती और फिर मंच पर आना असंभव हो जाता है।      
     हाँ, तो हम बात रहे थे जिस दिन इनकी कवि महोदय की कविताओं की लाइने नहीं छपती, ये तुरंत संयोजक को मोबाइल पर हिला देते, मानों कोई भूकंप आ गया हो। संयोजक महोदय बेचारे समझाते-समझाते थक जाते कि हमने तो आपकी लाइनें दी थीं, अब पेपरवालों ने नहीं छापा तो हम क्या करे,हो सकता है उस दिन कोई विज्ञापन मिल गया होगा और उसे छाप दिया होगा या पेपर में ज्यादा जगह नहीं होगी तो उन्होंने समाचार काटकर अपने हिसाब से कर दिया, लेकिन ‘अनपढ़ तो समझाया जा सकता है, लेकिन एक पढे लिखे मूर्ख को नहीं’ वे इतने बडे वाले मूर्ख है कि वे किसी बात को मानने को तैयार नहीं होते।       
     एक बार ऐसे ही एक दिन एक कवि सम्मेलन का समाचार छपा जिसमें इनकी लाइनें अदृश्य थीं, फिर क्या था इन्होंने तुरंत मुझे मोबाइल किया, क्योंकि कार्यक्रम मेरे संयोजन में हुआ था। न हेलो न हाय, सीधे धंाय-धांय और सीधे वाकयुद्ध शुरू, तुम पक्षपात करते हो,अपने को बहुत बड़ा समझते हो तुमने मेरा नाम क्यों नहीं दिया?,ऐसे ही एक अन्य छापस रोगी ने तो मुझे धमकी तक दे दी कि इस बार कुछ भी हो जाये तुम्हें संस्था का अध्यक्ष नहीं बनने देंगें। हमने भी कह दिया कि तुम भगवान नहीं आम सहमति से चुनाव होगा, अब ये बात अलग है कि इनके अलावा विरोध करने वाला दूसरा कोई नहीं है,सभी संतुष्ट है, लेकिन कहते है कि ‘खिसयाई बिल्ली खंभा ही नोंचे’ और अब यह बिल्ली बूढ़ी हो गयी है और इसकेे नाखून ही बूढ़े हो गये है लेकिन फिर भी ऐंठ नहीं गयी है। कहते है ‘रस्सी जल गयी पर ऐंठ नहीं गई’ उक्ति को चरितार्थ कर रहे है।          
     आज का पेपर पढ़ा हम समझ गए कि आज फिर पागलपन का छापास दौरा पड़ा हैं फिर भी हमने अनजान होते हुए कहा-नहीं, क्यों क्या बात है। वे बोले आज फिर केवल हमारी लाइने नहीं छपी है सबकी छपी है और नाम तक गोल है। (हमनेे मन ही मन में कहा कि -तुम खुद गोल हो अर्थात शून्य हो,जीरो हो, लेकिन समझते अपने को हीरो है।) मैंने उन्हें अपनी सफाई देते हुए कहा कि भई मैंने तो सभी कि लाइने दी थी, विस्वास नहीं हो तो मेरी रिपोर्ट की फोटो कापी देख लो,बात तो उनकी समझ में आ गयी कि पेपरवाले ने ही नहीं छापा है, लेकिन फिर वहीं जुमला दोहराया कि इस प्रमुख पेपर में मेरा नाम नहीं आता है। मैंने कहा भई दूसरे पेपरों में तो तुम्हारा नाम है दस पेपरों में से किसी एकाद में नहीं आया तो क्या गजब हो गया।    
            वे फिर तैश मे आकर बोले- अरे वाह ! कैसे नहीं हो गया। यह पेपर शहर में सबसे ज्यादा पढ़ा जाता हैं (हमने मन ही मन फिर बुदबुदाते हुए कहा कि इसीलिए तो आपका नाम उसने नहीं दिया वह समझदार पत्रकार है।) मैंने कहा कि- हमने तो दिया था अब अगर उसने नहीं छापा तो इसमें मेरा क्या कसूर हैं। हो सकता उसकी तुम्हारी पिछले जनम् की दुश्मनी होगी इसलिए वह इस जनम् में तुम्हें नहीं छाप कर चुका रहा है। इतना सुनना था कि उन्होंने फौरन अपना मोबाइल काट दिया हमने भी राहत ही सांस ली, सोचा चलो,पीछा छूटा।  
 -    राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’        
संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका       
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़   
   शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)  
     पिनः472001 मोबाइल-9893520965   
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शनिवार, 2 मई 2015

व्यंग्य- ‘‘ लक्ष्मी जी का इंटरव्यू ’’ (व्यंग्य-राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’)

व्यंग्य- ‘‘ लक्ष्मी जी का इंटरव्यू ’’



                    (व्यंग्य-राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’)
               
                लक्ष्मी जी को आज, कलयुग में इस धरती लोक में सबसे ज्यादा पूजा जाता है।  मेरा मानना है कि उनके पतिदेव विष्णु जी भी स्वर्ग लोक में उनका उतना नाम नहीं लेते होगें, जितना हम पृथ्वीवासी यहाँ पर उनका नाम,ध्यान एवं पूजा करते है उनका महत्व हर पल महंगाई की तरह बढ़ता ही जा रहा है। लक्ष्मी जी आज सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण एवं बहुत उपयोगी हो गयी है। गरीब हो या अमीर सभी लक्ष्मी जी के पीछे हाथ धोकर पडे हैं।कुछ उनसे आगे भी निकल गये है।। मै भी लेखक एवं पत्रकार होने के नाते उनके पीछे पड़ गया और उनका इंटरव्यू लेने के लिए बडी मुश्किल से उन्हें तैयार किया लक्ष्मी जी ने समयाभाव के कारण बहुत ही कम समय में संक्षिप्त में इंटरव्यू के माध्यम से जो बातें की वह इस प्रकार है-
मैंने पहला प्रश्न पूछा-  हे देवी लक्ष्मी जी, आपने अपना वाहन ‘उल्लू’ को ही क्यों चुना ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया- क्योंकि सभी लोग मेरे पीछे पडे़ रहते हैं, उन्हें उल्लू की तरह सत्य एवं धर्म ,सही और गलत कुछ भी दिखाई नहीं देता है और वे लोग दूसरों को  उल्लू बनाते रहते है और मैं उनको उल्लू बनाती रहती हँू। उल्लू हम दोनों के बीच काॅमन हेाता है इसलिए हमने अपना वाहन उल्लू को ही चुना।
मैंने दूसरा प्रश्न पूछा-        हे देवी जी, आप गरीबों के पास क्यों नहीं रहती ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     क्योंकि गरीब लोग हमेशा मेरा रोना ही रोते रहते है, कहते है कि मेरे पास कुछ नहीं है काम धन्धा कुछ करते नहीं और मुफ़्त में मुझे पाने के ख्वाब देखते रहते है यदि मैं कहीं से प्राप्त भी हो जाऊँ तो उसे शराब और जुआ आदि में नष्ट कर देते हंै। वे मुझे अपने पास स्वयं नहीं रखते
मैंने तीसरा प्रश्न पूछा-    आप अमीरों के पास ही क्यों अधिक रहना पंसद करती हो ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     क्योंकि अमीर लोग रोज उठते से ही नियम से मेरी पूजा-अर्चना करते     है मुझे सदा शुद्ध घी एवं मावा की बढि़या मिठाईयाँ खिलाते रहते हैं मेरी हिफाजत करते है, मेरी चिंता में चिंता ग्रस्त रहते हैं मेरी नाम की माला चैबीस घण्टे जपते रहते है और यहाँ तक कि मेरी चिंता में खुद ही रोगग्रस्त हो जाते है, लेकिन मुझे फिर भी नहीं भूलते यहाँ तक कि मेरी ख़ातिर वे अपने माँ-बाप एवं रिस्तेदारों आदि तक को भूल जाते हैंैं। वे मुझे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं मेरे लिए अपनी जान तक दे देते है रहने की बेहतरीन व्यवस्था करते हैं। इतना त्याग गरीब कभी नहीं कर सकता।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    सुना है आप बहुत चंचल हा,े एक स्थान पर ज्यादा टिकती नहीं हो ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     हाॅ, वो क्या है कि कभी-कभी कुछ अमीरों को मेरी वजह से कुछ ज्यादा     ही घमंड हो जाता है और वे मद में चूर होकर मुझे तक भूल जाते है ऐसे     में मुझे उनकी सही औकात दिखाने के लिए वहाँ से किसी चोरी,डकैतीया छापा पड़वाकर या किसी अन्य माध्यम से दूसरी जगह जाना पड़ता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    ऐसा माना जाता है कि हम इंसानों में विशेष प्रजाति ‘नेता’ एवं ‘पुलिस’ पर आपकी बहुत कृपा दृिष्ट रहती है ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     हाॅ, यह बात सही है नेता मेरा प्रिय शिष्य है क्यांेकि वो मुझे देश के                     विभिन्न स्थानों के साथ-साथ विदेश भ्रमण पर ले जाता है मेरा मन एक                     स्थान,एक देश में रह कर ऊब जाता है। इसीलिए नेता मुझे विदेश भ्रमण                         कराता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपको कौन सा देश भ्रमण करने में सबसे ज्यादा मज़ा आता है ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मुझे भारत में मुंबई,दिल्ली एवं विदेशों में स्विट्जरलंैंड बहुत पंसद है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आप कहाँ रहना अधिक पसंद करती हैं आपका पसंददीदा स्थान ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मुझे स्विट्जरलंैंड में स्विस बैंकों में ‘यू बी एस’ बैंक बहुत ज्यादा प्रिय है मैं
अधिकांश समय वहीं पर रहती हूँ। यदि मैं मर भी गयी तो इसी जगह पर मरना पसंद करूंगी। वहाँ का एकांत मुझे बहुत पसंद है कोई डिस्टर्वेंस नहीं करता।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपका स्थायी पता क्या है ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     वैसे मेंै रहती तो विष्णु जी के साथ ही हँू ,लेकिन उन्हें मेरे साथ रहने का वक्त ही नहीं मिलता, इसलिए मैंने अपना एक नया फ्लैट स्विट्जरलंैंड में स्विस बैंकों में ‘यू बी एस’ बैंक खरीद लिया है वही पर रहती हँू।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    और पुलिस पर भी तो आप मेहरवान होती है कोई खास वजह ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     भई ऐसा है कि पुलिस मेरे प्रिय शिष्य नेता की भी शिष्य होती हैं इसलिए                     उसका भी थोड़ा बहुत ध्यान रहना पड़ता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपको प्रसन्न करने के क्या उपाय हैं, बतायें ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     यह उपाय तो आप मेरे शिष्यों से ही सीख सकते है, आप नेता, पुलिस, चोर, उद्योगपतियों आदि से ट्रेनिंग भी ले सकते हो।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    दीपावली पर आपकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है लेकिन फिर भी आप हम                 लोगों से प्रसन्न क्यों नहीं होती ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मैं तो सभी के पास आना चाहती हँू लेकिन क्या करूं मजबूर हँू एक तो मेरा वाहन उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता है और दूसरा मैं दीपावली पर आना चाहँू तो आपके पटाखों और बमों की आवाज सुनकर     मेरा उल्लू दूर से ही लौट जाता है।
मैंने एक अंंितम प्रश्न पूछा-    आपकी हमशक्ल को आपसे ज्यादा प्रसिद्धी क्यों मिल रही है ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     ऐसा है कि वो मेरी जुड़वा बहन हैं मैं पहले हुई थीं वह एक मिनिट बाद                     इसलिए उसका नाम ‘दो नंबर की लक्ष्मी’ हैं और छोटे को तो हमेशा ही  ज्यादा प्यार मिलता है। इसलिए वह छोटी होने का फायदा उठा रही है।
मैंने लक्ष्मी जी को इंटरव्यू लेने के लिए समय देने के पर बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और अब मैं आपको उल्लू बनाने के लिए यह व्यंग्य लिख रहा हँू।

    888    / राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
        संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
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मंगलवार, 11 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान

व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान 
                               ( राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)


                                   
                                           
                आज भारत में नेता धरती के 'कलयुगी भगवान बन गये है या चमचों द्वारा बना दिये गये है, बात एक ही हैं. यह कलयुगी भगवान अपने सभी अच्छे-बुरे काम पैसों की दम पर कर-करा लेतेदेते हंै और जो कुछ विशेष काम पैसों की दम पर नहीं होते, उन्हें वे अपने पाले गये चमचों एवं गुण्ड़ों आदि से कुछ अन्य विशेष प्रकार के तरीकों से करा लेतेदेते हैं. ये कलयुगी भगवान धन एवं अपने चमचों की अधिक संख्या (बहुमत) के प्रभाव से 'इन्द्रासन की तरह 'कुर्सासन को पाने के लिए सभी प्रकार के दाँव-पेंच अपनाते है एवं अंतत: 'कुर्सासन पाकर या हथियाकर ही दम लेते हंै.
                अपने नेता काल को जो लगभग पाँच साल का होता है जिससे सिद्ध भी होता हैै नेता काल है, जिसमें किये गये हज़ार झूठे वायदों में से दो-तीन जो धोखे से या र्इश कृपा से पूरे हो जाते है या किसी अन्य के द्वारा पूरे कर दिये जाते है लेकिन वह इसका श्रेय अपने ऊपर लेने से नहीं चूकते हैं. आगामी चुनाव के समय ये इन कथित कामों का जिक्र इतना बढ़ा-चढ़ाकर करते है अपनी स्वप्रशंसा करने के मौके कभी भी नहीं चूकते चमचों द्वारा भी करवाते रहते है.  गाँवों की मासूम जनता पर इसका असर शीघ्र पड़ जाता है वह उसे सच ही मान लेती है कहा भी गया है कि यदि 'सौ बार झूठ बोलों तो वह सच मान लिया जाता है. इन्हीं की दम पर वह पाँच साल बाद पुन: आगामी चुनाव में 'कुर्सासन पाने के लिए प्रयासरत रहते हैं. जो कार्य प्रारंभ करते हंै उन्हें अधूरा जानबूझकर छोड़कर आगामी काल में पूर्ण करने हेतु वोट माँगते हंै.
                ये कलयुगी भगवान काम तो 'रावण का करते है, किन्तु समझते है या प्रदर्शित करते है अपने आप को भगवान 'राम के समान. भाेंली भाली जनता को गुमराह करके झूठे वायदे एवं लालच देकर चुनाव के समय उन्हें खुश करने के लिए और अपना उल्लू सीधा करने के लिए अर्थात वोट झटकने के लिए वे उन्हे कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद देते भी देते हंंै. प्रसाद उनकी हैसियत के हिसाब से या घर में उनके वोटरों की संख्या के आधार पर दिया जाता है. कुछ प्रमुख शैतानी प्रसाद तो चुनाव के समय लगभग सभी को आसानी से प्राप्त हो जाते है जैसे-कंबल,शराब एवं पैसा आदि. कुछ नेता अपने घर में या कार्यालय में ही भंडारा एवं
मधुशाला खेल लेते हंै. ये खुली हुर्इ अवैध मधुशालाएँ आबकारी विभाग, पुलिस विभाग, चुनाव विभाग के
अधिकारियों को दिखार्इ नहीं देती, क्योंकि उनकी आँखों में रिश्वत की पटटी बाँध दी जाती हैं या उस काल के प्रभाव से उनकी नज़र जाती रहती हैं.
                एक बार के एक चुनाव में दक्षिण भारत के एक कलयुगी भगवान ने वोटरों को रिझाने के लिए एक गाँव में प्रत्येक घर में एक-एक टी. व्ही. तक मुक्त में बाँट दी थीं. वर्तमान में सिम, मोबाइल,घड़ी, टयूबवैल, कर्जे का भुगतान भी प्रसाद रूप में बाँट देते हैं, परन्तु मज़े कि बात यह रही कि वे इतना अधिेक प्रसाद देने के बाद भी अपने भक्तों के वोट प्राप्त नहीं कर पाये और चुनाव हार गये.
                नेताओं के वोट माँगने या प्रसाद देने के तरीके भी भिन्न-भिन्न है. जैसे कुछ नेता हाथ-पाँव जोड़ कर या कुछ तोड़कर या तोड़ने की धमकी देकर भी वोट माँगते हैं. तो कुछ नेता कँंबल, भोजन, शराब, साड़ी,चाँदी के बिछियाँ, पायलें सौ, पाँच सौ एवं हज़ार तक के नोट आदि चुनाव के समय बाँटते फिरते दिख जायेगे. भले ही बाद में वे सूद समेत चंदे के रूप में उनसे कर्इ गुने अधिक (चक्रवृद्धि ब्याज) वसूल कर लेते हैं. कुछ बहुत ही चालाक किस्म के कलयुगी भगवान आपके प्रिय जैसे महिलाओं को पति की कसम, आदमी को उनके बेटों की कसमें रखाकर वोट हथियाने की कोशिश करते
हैं, खासकर गाँवों की भोली जनता उनके जाल में जल्दी फँस जाती हैं, और उन्हीं को अपना वोट देकर जिता भी देती हैं, क्योंकि हमारे यहाँ पर झूठी कसमें खाने से जिसकी भी कसम खायी या रखी या दी जाती है, उसको बहुत नुकसान होता है, ऐसा कहा एवं माना जाता है. गाँवों की वोटरी जनता भले ही झूठी कसमें भगवान के डर से न खाये, किन्तु इन्हीं झूठी कसमें खा-खाकर अदालतों में सैंकड़ों लोग अपराधी होते हुए भी छूट जाते हैं, सुना गया है कि अदालत, नेता, बाबू, सरकार, वकीलों एवं दुकानदारों की तो रोजी -रोटी ही इन झूठी कसमों के दम पर ही चलती हैं.

                        कुछ भी हो, लेकिन इन कलयुगी भगवान को, आज वो सभी सुख-सुविधाएँ इस धरती पर मिलती है,जो शायद इन्द्र को स्वर्ग लोक में भी न मिलती हो. ऊपर वाले असली भगवान तो दैत्य,राक्षस आदि से डरते भी
हैं ,लेकिन ये धरती के कलयुगी भगवान किसी से भी नहीं डरते। हाँ, चुनाव के समय जरूर कुछ समय के लिए ये जरूर अपने क्षेत्र के मतदाताओं से डरते है,लेकिन वे इन्हें प्रसन्न करने के विभिन्न तरीके भी जानते हैं. उन्हें अच्छी तरह से पता होता है कि कौन सा भक्त किस प्रकार के प्रसाद से प्रसन्न हो जायेगा और उसे अपने बस में करने का मंत्र उन्हें अच्छी तरह से आता है. वे उस मंत्र को अपने चेलों को अच्छी तरह से समझा एवं सिखा देते है. शिविर,कार्यशाला लगाकर ट्रेण्ड कर देते हैं. वे इस मंत्र का प्रयोग केवल पाँच वर्ष में ही चुनाव आने पर करते हैं और जीत कर या हारकर इन पाँच वर्षो तक वे अपने इन मंत्रों को सिद्ध करने में दुबारा लगे रहते हैं.
                                     राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                                      संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
                                      अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
                                    शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
                                       पिन:472001 मोबाइल-9893520965
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