- राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
निःसन्देह तुम्ही मेरा पहला प्यार हो, तुम्हारे ‘अलावा’ बाकी सब ‘छलाबा’ है। ‘‘तुम्हीं मेरी काशी और तुम्हीं मेरी काबा हो’’। मैं शत प्रतिशत भारतीय पति हूँ किसी अन्य से प्यार करने का दुःसाहस मुझ जैसा तुच्छ प्राणी चाहते हुए भी नहीं कर सकते, क्योंकि मैं जहाज के एक पंछी के समान हूँ जिसे अंततः वापिस आना ही पड़ता है।
सच मानो तुम्हीं मेरा पहला और तुम्हीं मेरा आखिरी प्यार भी हो क्योंकि मैंने चोट इतनी गहरी पाई है जिधर देखता हूँ उधर खाई ही खाई है। जब मेरे पहले प्यार का अनुभव ही ऐसा है तो दूसरा कैसा होगा, ये सोचकर तो मेरी रूह काँप जाती है, लेकिन तभी मेरे अंदर से एक व्यंग्य जाग जाता है वह शांति के साथ बाहर आता है जो मुझे असीम शांति दिलाता है। परन्तु तुम्हें मेरा यह ‘शांति सुख’ कहाँ भाता है। तुम सदा क्रांति की बाते करने लगती हों, लेकिन मुझे तो यही शांति, सम्वेदना, भावना, सदभावना, शिल्पी, शैली ही सदा भाती है क्योंकि इसी में तो व्यंग्यकार की आत्मा समाती है।
मुझे तुम्हारा ‘पेन’ की तरह लम्बा आकार ‘स्याही’ की तरह श्याम वर्ण बहुत सुहाता है, क्योंकि श्याम वर्ण तो हमारे ईष्टदेव का भी नाता है। वैसे मुझे तुम्हारा पडौसन की साडी देखकर और उसकी प्रशंसा सुनकर ‘निंदारस’ से ओतप्रोत व्यंग्य के बाण चलाना कामदेव की याद दिलाता है। उस बहाने मुझे भी उस सुंदर कामिनी,कंचन-सी काया वाली पडौसन को कुछ देर घूर लेने मौका मिल जाता है। यानि अपनी आँखे चार करने का सौभाग्य मिल जाता है। जो नए-नए विचारों को जन्म देता है उस बहाने कुछ नया लिखने की थीम मिल जाती है और आशा से तो आसमान टिका है। कभी-कभी विल्ली के भाग्य से छींका भी टूट जाता है।
हे मेरे व्यंग्य की अद्भुद व्यंजना कभी-कभी मुझे रंज (दुःख) करते हुए पडौसन रंजना की याद दिलाता है, लेकिन तुम मुझे तंज (व्ंयग्य) करते हुए गंज (गंजा) कर देने की धमकी यदाकदा देती रहती हो। तुम्हारी ये शैली मुझे किसी ‘आलोचक’ की भांति लगती है। लेकिन आज ‘आ’ की नहीं ‘सा’ की जरूरत है। ‘अ’ मतलब अनावश्यक, अयोग्यता, अराजकता, अपात्र, अभिमान, असहयोग, असम्मान, अनादर, आलोचना,आम, बाग, अनशन, असत्य और असहिष्णुता आदि-आदि।
‘सा’ से मेरा मतलब है- सहिष्णुता, समालोचना, समझ, सहयोग, सदभावना, सम्प्रेषणता, सहज, सारांश, सार, सटीक, सुशील, संवाद, सिफारिस, समाज, सुसराल, साले, साली, ससुराल, शांति, समाधान, और सैकड़ा भर सादर शाल,श्रीफल और सम्मान आदि।
मेरा पहला प्यार पानी, पपीता, प्याज, कविता के पद, डायरी के पन्ने, पुष्प, पराग, प्रयास, पहचान, पहनावा आदि भी हो सकते है लेकिन मेरा पहला प्यार मेरी पर्सनल प्रिय पत्नी ही है ऐसा ‘वो’ मानती है। मैं नहीं। वैसे मेरे दिल भी मानता है। जो कुछ नहीं जानता है और दिल तो पागल होता है। भला एक पागल की बात कौन मानता है,लेकिन सहीतो यह है कि एक साहित्यकार रूपी पति का ‘पहला प्यार किसी परिषद का सम्मान पत्र और पुरस्कार के अलावा भला और क्या हो सकता हैं।
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/ राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
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