व्यंग्य -''सास-बहू और सास
(राजीव नामदेव ''राना लिधौरी)
'सास पहले माँ होती है, फिर बेटे की शादी होते ही घर में बहू के आने पर 'सास बन जाती है और जब सास बनती है अर्थात उसका प्रमोशन हो जाता है, क्योंकि सास अब 'खास होते हुए बास बन जाती है और फिर भारतीय बास अपने खास होने का हमेशा अहसास दिलाता रहता है उसे अपने आधीन कार्य करने वालों पर हुक्म चलाने की बीमारी हो जाती है और जब अति हो जाती है तो बहू सास का 'लहू पीने के लिए या निकालने के लिए कमर कसके तैयार हो जाती है।
जिस प्रकार आधुनिक तैयार चटनी जो बाज़ार में बनी बनायी बोतलों में मिलती है तथा प्राय: टमाटर एवं मिर्ची से बनती है उसे 'सास कहा जाता है। सास और सास इन दोनो में बहुत समानतायें हैं। जैसे सास खाने में तीखा,चटपटा,मजेदार और स्वादिष्ट लगता है, ठीक वैसे ही सास भी अपनी बहू को तीखी और तेज लाल मिर्च की तरह लगती है। दोनो का कम से कम उपयोग यदि चटनी की तरह किया जाये तो बहुत अच्छा रहता है ,लेकिन कहीं खासकरा बहू ने ज्यादा खा लिया तो मतलब सास को चटनी नहीं, सब्जी समझ कर एवं सास को 'बास न मानकर उसे 'आम की तरह चूसने लगी तो बहू का तो हाजमा एवं स्वास्थ्य और कहीं-कहीं पर तो फिगर भी खराब होने की पूरी संभावना रहती है।
सास को अधिक समय तक खुला रखने पर वह खराब होने लगता है ठीक उसी तरह से 'सास को अधिक समय तक खास बनाने पर भी वह पत्नी (बहू) को 'रास नहीं आता है और वह सास उनके गले की फाँस के समान लगती है।
बहुत ही आश्चर्य की बात यह है कि पति को ये तीनों बहू,सास और सास बहुत प्रिय होती है, वह इन तीनों में से किसी एक को भी नहीं छोड़ सकता।कुछ बुद्धिमान तीनों से अपना काम बखूबी निकाल लेते है, तो कुछ लोग सास और सास को खास जगह पर रखते हैं और बहू को पास रखते है। पति को बहू 'रानी और माँ को बहू 'नौकरानी लगती है,लेकिन वक़्त पड़ने पर यहीं नौकरानी भवानी (दुर्गा) बन जाती है।
हालाकि सास-बहू के मामले में बेचारे 'पति नामक प्राणी की ऐसी 'गति हो जाती है कि उसकी फिर 'मति ही काम नहीं करती। समझदार ऐसी सिथति में दोनो कि बातों कोसुनकर भी मौन वृत धारण कर लेते है या वहाँ से खिसक कर अपनी जान बचाते लेते है और जो खामोश रहना नहीं जानते और सास-बहू मे से किसी भी एक का पक्ष लेते तो उनकी हालत 'धोबी के गधे जैसे हो जाती है जो न घर (माँ) का रह जाता है, न घाट (पत्नी) का फिर उसका दिल यह गाना गाकर रह जाता है कि-'एक को मनाओं तो दूजा रूठ जाता है,पत्नी का पति या माँ का हो बेटा टूट जाता है टूट जाता है।
सास, बहू और बेटा तीनों एक आटो रिक्शा के समान होते है जिसमें तीनों टायरों की आवश्यकता रहती है। यदि एक भी पंचर हो जाये, तो वह आगे नहीं चल पाता हैं। ठीक इसी प्रकार सास, बहू और बेटा तीनों की जिन्दगी में 'सास बहुत 'खास होता है, उसे नज़र अदाज़ नहीं करना चाहिए। उसके महत्व को समझते हुए उसका प्रयोग सावधानी एवं सही मात्रा में ही करना चाहिए अन्यथा वह आपको बार-बार किसी खासघर (पाखाने) भी पहुँचा सकता है। जिससे आपके हाथ पाँव तक ठीले पड़ सकते है खैर हमें सास-बहू और सास तीनों का लुत्फ जब तक उठाना चाहिए जब तक ये हमें असानी से पचनीय एवं उपलब्ध हो सके।
लघुकथाकार- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
मोबाइल-9893520965
(राजीव नामदेव ''राना लिधौरी)
'सास पहले माँ होती है, फिर बेटे की शादी होते ही घर में बहू के आने पर 'सास बन जाती है और जब सास बनती है अर्थात उसका प्रमोशन हो जाता है, क्योंकि सास अब 'खास होते हुए बास बन जाती है और फिर भारतीय बास अपने खास होने का हमेशा अहसास दिलाता रहता है उसे अपने आधीन कार्य करने वालों पर हुक्म चलाने की बीमारी हो जाती है और जब अति हो जाती है तो बहू सास का 'लहू पीने के लिए या निकालने के लिए कमर कसके तैयार हो जाती है।
जिस प्रकार आधुनिक तैयार चटनी जो बाज़ार में बनी बनायी बोतलों में मिलती है तथा प्राय: टमाटर एवं मिर्ची से बनती है उसे 'सास कहा जाता है। सास और सास इन दोनो में बहुत समानतायें हैं। जैसे सास खाने में तीखा,चटपटा,मजेदार और स्वादिष्ट लगता है, ठीक वैसे ही सास भी अपनी बहू को तीखी और तेज लाल मिर्च की तरह लगती है। दोनो का कम से कम उपयोग यदि चटनी की तरह किया जाये तो बहुत अच्छा रहता है ,लेकिन कहीं खासकरा बहू ने ज्यादा खा लिया तो मतलब सास को चटनी नहीं, सब्जी समझ कर एवं सास को 'बास न मानकर उसे 'आम की तरह चूसने लगी तो बहू का तो हाजमा एवं स्वास्थ्य और कहीं-कहीं पर तो फिगर भी खराब होने की पूरी संभावना रहती है।
सास को अधिक समय तक खुला रखने पर वह खराब होने लगता है ठीक उसी तरह से 'सास को अधिक समय तक खास बनाने पर भी वह पत्नी (बहू) को 'रास नहीं आता है और वह सास उनके गले की फाँस के समान लगती है।
बहुत ही आश्चर्य की बात यह है कि पति को ये तीनों बहू,सास और सास बहुत प्रिय होती है, वह इन तीनों में से किसी एक को भी नहीं छोड़ सकता।कुछ बुद्धिमान तीनों से अपना काम बखूबी निकाल लेते है, तो कुछ लोग सास और सास को खास जगह पर रखते हैं और बहू को पास रखते है। पति को बहू 'रानी और माँ को बहू 'नौकरानी लगती है,लेकिन वक़्त पड़ने पर यहीं नौकरानी भवानी (दुर्गा) बन जाती है।
हालाकि सास-बहू के मामले में बेचारे 'पति नामक प्राणी की ऐसी 'गति हो जाती है कि उसकी फिर 'मति ही काम नहीं करती। समझदार ऐसी सिथति में दोनो कि बातों कोसुनकर भी मौन वृत धारण कर लेते है या वहाँ से खिसक कर अपनी जान बचाते लेते है और जो खामोश रहना नहीं जानते और सास-बहू मे से किसी भी एक का पक्ष लेते तो उनकी हालत 'धोबी के गधे जैसे हो जाती है जो न घर (माँ) का रह जाता है, न घाट (पत्नी) का फिर उसका दिल यह गाना गाकर रह जाता है कि-'एक को मनाओं तो दूजा रूठ जाता है,पत्नी का पति या माँ का हो बेटा टूट जाता है टूट जाता है।
सास, बहू और बेटा तीनों एक आटो रिक्शा के समान होते है जिसमें तीनों टायरों की आवश्यकता रहती है। यदि एक भी पंचर हो जाये, तो वह आगे नहीं चल पाता हैं। ठीक इसी प्रकार सास, बहू और बेटा तीनों की जिन्दगी में 'सास बहुत 'खास होता है, उसे नज़र अदाज़ नहीं करना चाहिए। उसके महत्व को समझते हुए उसका प्रयोग सावधानी एवं सही मात्रा में ही करना चाहिए अन्यथा वह आपको बार-बार किसी खासघर (पाखाने) भी पहुँचा सकता है। जिससे आपके हाथ पाँव तक ठीले पड़ सकते है खैर हमें सास-बहू और सास तीनों का लुत्फ जब तक उठाना चाहिए जब तक ये हमें असानी से पचनीय एवं उपलब्ध हो सके।
लघुकथाकार- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
मोबाइल-9893520965
