शनिवार, 21 सितंबर 2013

sas bahu aur sas.... vyan सास बहु और सास एक व्यंग्य

व्यंग्य -''सास-बहू और सास
                                    (राजीव नामदेव ''राना लिधौरी)
'सास पहले माँ होती है, फिर बेटे की शादी होते ही घर में बहू के आने पर 'सास बन जाती है और जब सास बनती है अर्थात उसका प्रमोशन हो जाता है, क्योंकि सास अब 'खास होते हुए बास बन जाती है और फिर भारतीय बास अपने खास होने का हमेशा अहसास दिलाता रहता है उसे अपने आधीन कार्य करने वालों पर हुक्म चलाने की बीमारी हो जाती है और जब अति हो जाती है तो बहू सास का 'लहू पीने के लिए या निकालने के लिए कमर कसके तैयार हो जाती है।
                जिस प्रकार आधुनिक तैयार चटनी जो बाज़ार में बनी बनायी बोतलों में मिलती है तथा प्राय: टमाटर एवं मिर्ची से बनती है उसे 'सास कहा जाता है। सास और सास इन दोनो में बहुत समानतायें हैं। जैसे सास खाने में तीखा,चटपटा,मजेदार और स्वादिष्ट लगता है, ठीक वैसे ही  सास भी अपनी बहू को तीखी और तेज लाल मिर्च की तरह लगती है। दोनो का कम से कम उपयोग यदि चटनी की तरह किया जाये तो बहुत अच्छा रहता है ,लेकिन कहीं खासकरा बहू ने ज्यादा खा लिया तो मतलब सास को चटनी नहीं, सब्जी समझ कर एवं सास को 'बास न मानकर उसे 'आम की तरह चूसने लगी तो बहू का तो हाजमा एवं स्वास्थ्य और कहीं-कहीं पर तो फिगर भी खराब होने की पूरी संभावना रहती है।
                सास को अधिक समय तक खुला रखने पर वह खराब होने लगता है ठीक उसी तरह से 'सास को अधिक समय तक खास बनाने पर भी वह पत्नी (बहू) को 'रास नहीं आता है और वह सास उनके गले की फाँस के समान लगती है।
                बहुत ही आश्चर्य की बात यह है कि पति को ये तीनों बहू,सास और सास बहुत प्रिय होती है, वह इन तीनों में से किसी एक को भी नहीं छोड़ सकता।कुछ बुद्धिमान तीनों से अपना काम बखूबी निकाल लेते है, तो कुछ लोग सास और सास को खास जगह पर रखते हैं और बहू को पास रखते है। पति को बहू 'रानी और माँ को बहू 'नौकरानी लगती है,लेकिन वक़्त पड़ने पर यहीं नौकरानी भवानी (दुर्गा) बन जाती है।
                हालाकि सास-बहू के मामले में बेचारे 'पति नामक प्राणी की ऐसी 'गति हो जाती है कि उसकी फिर 'मति ही काम नहीं करती। समझदार ऐसी सिथति में दोनो कि बातों कोसुनकर भी मौन वृत धारण कर लेते है या वहाँ से खिसक कर अपनी जान बचाते लेते है और जो खामोश रहना नहीं जानते और सास-बहू मे से किसी भी एक का पक्ष लेते तो उनकी हालत 'धोबी के गधे जैसे हो जाती है जो न घर (माँ) का रह जाता है, न घाट (पत्नी) का फिर उसका दिल यह गाना गाकर रह जाता है कि-'एक को मनाओं तो दूजा रूठ जाता है,पत्नी का पति या माँ का हो बेटा टूट जाता है टूट जाता है।
                सास, बहू और बेटा तीनों एक आटो रिक्शा के समान होते है जिसमें तीनों टायरों की आवश्यकता रहती है। यदि एक भी पंचर हो जाये, तो वह आगे नहीं चल पाता हैं। ठीक इसी प्रकार सास, बहू और बेटा तीनों की जिन्दगी में 'सास बहुत 'खास होता है, उसे नज़र अदाज़ नहीं करना चाहिए। उसके महत्व को समझते हुए उसका प्रयोग सावधानी एवं सही मात्रा में ही करना चाहिए अन्यथा वह आपको बार-बार किसी खासघर (पाखाने) भी पहुँचा सकता है। जिससे आपके हाथ पाँव तक ठीले पड़ सकते है खैर हमें सास-बहू और सास तीनों का लुत्फ जब तक उठाना चाहिए जब तक ये हमें असानी से पचनीय एवं उपलब्ध हो सके।           
                        
लघुकथाकार-    राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
        संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
        अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ     
        शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
        मोबाइल-9893520965
    

aadhunik shbdakosh vyang आधुनिक शब्दकोश एक व्यंग्य

      व्यंग्य -''आधुनिक शब्दकोश
 
                            (व्यंग्य-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)               
                हम वर्तमान में 'मोबाइल एवं 'इंटरनेट युग में जी रहे है। समय इतनी तेजी से बदल रहा है कि पूछो मत, शब्द अपने वास्तविक अर्थ खोते जा रहे है उनकी परिभाषाये बदल गयी है। वही घिसेपिटे शब्द सुन-सुनकर आदमी बोर होने लगा है। इसलिए कुछ शब्द जो बहुत ज़्यादा उपयोग में आने लगे है उनके अर्थ एवं परिभाषाएँ लोगों ने अपने हिसाब से रख ली है। हम यहाँ कुछ मजेदार एवं बहुत अधिक प्रयोग में होने वाले आम बोलचाल वाले कुछ प्रचलित शब्दों के अर्थ एवं नयी परिभाषाएँ प्रस्तुत कर रहे है, जो कि आपको अवश्य ही पसंद आयेगी।
                नेता-गिरगिट का साथी,कहीं-कहीं गाली के रूप में भी इस शब्द का उपयोग  किया जाता है, लेकिन सुख सुविधाओं में भगवान इन्द्र से भी बड़ा। वोट-नोट या चोट से खरीदने का साधन। मतदान-जिसकी लाठी उसकी भैंस। केले का छिलका-जमीन से भैंट कराने वाला दलाल या धूल चटाने वाला। कम्प्यूटर- जल्दी चश्मा लगाने या अंधे होने की मशीन। चाय-कलयुग का अमृत।शराब अमीरों का फैशन और गरीबों की टेंशन। पालीथिन-गाय को मारने का फ्री का जहर। प्रेम विवाह-पहले बेस्ट फिर नेक्सट। विवाह-लड़काें के लिए बंधन और लड़कियों के लिए आखिरी मंजि़ल। इंटरनेट-घर बैठे ही बच्चों को शीघ्र वयस्क बनाने का साधन। चैलन-अश्लीलता दिखाने एवं अंधविश्वास बढ़ाने का सुलभ साधन। चश्मा-आँखों का पिंजरा। जेल-बिना किराये का घर। पडौ़सी-सबसे बड़ा दुश्मन सबसे अधिक ज्वलनशील(जलने वाला) पदार्थ। पैसा-जिसके पास जितना अधिक होता है उसकी चाहत उतनी ही अधिक बढ़ जाती है। भार्इ -आज बनते कसार्इ। दलाल- नहीं करते मलाल।
                हवार्इ जहाज-मनुष्य का पालतु पक्षी। टार्इ-बिना गुनाह की फाँसी, टी.व्ही.-बच्चों को बिगाड़ने का साधन। मास्टर-स्कूल की बजाय घर में टयूशन पढ़ाने में मास्टर, मेहनत-गरीब का आभूषण। मच्छर-बिना बुलाये मेहमान। मोबाइल- बहरे (रोगी) होने की अत्याधुनिक मशीन। र्इमानदारी-यह शब्द अब धरती से अदृश्य हो गया है, लेकिन कहीं-कहीं पर 'र्इद के चाँद की तरह दिखार्इ पड़ता है।
                झगड़ा-वकीलों का कमाऊ पूत। ब्यूटी पार्लर- जहाँ औरतें अपने बुढ़ापे से लड़ती है। पंखा(सीलिंग फेन)-आत्महत्या करने का सर्वाधिक प्रयोग किये जाने वाला घर में उपलब्ध साधन। रिश्वत-अपना काम कराने का सोर्टकट रास्ता। गिफ्ट-रिश्वत का आधुनिक रूप। फिल्में- अश्लीलता का ज़हर। विज्ञापन-लालच का जाल। बाबू-घूस लेन के लिये है साबू(कामिक्स चाचा चौधरी का साथी केरेक्टर)। पेट्रोलडीजल-अनमोल दृव्य। गैस सिलेण्डर-सीधी लाइन लगाना सिखाता है। लाइट- बिल कराता हुलिया टाइट। बेलन-महिलाओं सबसे प्राचीनतम हथियार। कालेज गर्ल-नेत्र भोजन। पत्नी-घर की मुर्गी दाल बराबर। खूबसूरत पड़ोसन-शुभ प्रभात। प्रेमिका का भार्इ-बिना वर्दी का पुलिसवाला। पुलिस-वर्दी वाला गुंडा। शिक्षण संस्थान-हो गये अब पसरट की दुकान। भारतीय रेल-आदमी रूपी भेड़-बकरियों ठेलम-ठेल। पानी- गर्मियों में याद दिलाये नानी। रोड वेज की बसे-कछुवा से धीमी चाल। क्रिकेट-आधुनिक जुआ (सटटा) खेलने का सुलभ साधन। क्रिकेट खिलाड़ी-फिसिंक्ग एवं विज्ञापन में हीरो खेलने में जीरो। हाकी-क्रिकेट के ऊपर उगा परजीवी पौधा।   
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लघुकथाकार-    राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                                    संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
                                    अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ     
                                        शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
                                         मोबाइल-9893520965
                                  

bundeli vyan- luk luk ki bimari लुक लुक की बीमारी एक व्यंग्य

बुन्देली व्यग्ंय - ''लुकलुक की बीमारी

                हमाये इतै कछु दिनन से नये-नये कवि पैदा हसेन लग,े पैला से वे कवितार्इ नर्इ करतते पर जब सै सरकार ने उनै रिडायर्ड करदऔ तबसै वे सठिया गये और 'सरतारौे बानिया का करे की कानात को अपनारये हते, सौ कोनऊ ने उनसे कै दर्इ कि कवि बन जाओ सौ उनने कर्इ कि कवि तो जन्मजात होत है ऐसे कैसे बन जात है? उनने कर्इ आजकाल तौ सबर्इ जने कवि बन जात है।कवि बनबे से जादा ऊखौं दिखावों करवौ जरूरी है। वे ठलुआ तो हो गये हते सो उन्ने कोशिस करी तो कछु इतार्इ कि कछु उतार्इ की जोर-तोर के चार छ: कवितायें बना डारी और कवि बन गये बार सफेद हते, उन्ना सोर्इ सफेद पैर लये तना सी दाढ़ी घर लर्इ, एक डायरी धर लर्इ, लो बन गये कवि। अब उने झटटर्इ अपनौ नाव कवियन में करवै की लुकी लुकी भर्इ, जा एक भौत बुरर्इ नर्इ बीमारी पर गयी जौ उनखौ पीछो अबे लौ नर्इ छोर रर्इ। अब शहर में कितऊ भी कोनऊ साहितियक पिरोगराम या कवि सम्मेलन हुये जै साहब उतै जरूर पौच जेहे। उन्हें पैचानवे में कोनऊ परेशानी नर्इ होत है, काइसै कै जै उतर्इ मंच कै ऐंगरें ही लुकलुकात फिरत है। कछु नर्इ तो तनक -तनक देर में मंच पै पौच कै मइक ठीक करन लगत है ऐसे लगत जैसे जै पिछले जनम में माइक सुधारवे के स्पेशलिष्ट भये हुये।
                एक बैर का हा भओ कि शहर में एक बुन्देली पै कवि सम्मेलन हतौ अब ये लुक लुक साब तौ बुन्देली में तनकऊ नर्इ लिख पातते, सौ उनकीे इतै कविता पढवै की दार नर्इ गलने हती, पर का करै, मजबूरी हती सौ जै सबसे पैला की लाइन में जगां अगेज कै सबसे पैला कुर्सी पै धररये। अब साब कवि सम्मेलन चालू भओ, सो जो इनै लुकलुक की बीमारी हती ऊकौ कीरा गुलबुलान लगौ सो इनै कछु न सूजी, जै उतर्इ से एक पैरे से पैराओ भओ गजरा ढूंढ लाये और मंच पै चढ कै ऊ समय जौन कवि पढ़ रओ हतो उखौ पैरा दओ, और तारी बजान लगे जैसे कछु जग्ग जीत लओ हो,सौ कछु लोगन ने उनके देखादेखी सोर्इ तारी बजा दर्इ। अब इनकी लुकलुकी तनक कम भर्इ सो जै अपनी जागा पै आकै बैठ गयें। आदा घंटे बाद इनै फिरकै लुकलुकी उठी, सौ जै फिरकै कऊ से एक गजरा ढूंढ कै लाये और मंच पै जान लगे, सौ पछार्इ बैठे श्रोताओं में से कोनऊ ने जोर से कर्इ -जौ कौ बब्बा अय। जौ भार्इ लुकलुकात फिररऔ, सौ बगल बारे ने कर्इ सठिया गओ है दूसरे नै कर्इ इतर्इ कौ नओ-नओ कवि बनो है सौ आज र्इखौ पढवे नर्इ मिल रओ, सो फरफरात फिर रओ और  गजरा डार -डार कै अपनौ मन भर रओ, एर्इ बहाने से मंच पे जावे की लुकलुकी शांत कररओ। एकाद बेर फोटो सोर्इ खिंच जात सौ जै ऊखौं मडवा कै अपने इतै घरे टांग लेत है और कत फिरत है कि हमने ऊके संगे कविता पडी हती वे तो हमाये मित्र है। अब फोटो देखवे वारे कौ का पतौ कि जा फोटो कैसे खिांची हती। जो बब्बा हर कवि सम्मेलन में जोर्इ नौटंकी करत है हम तौ कर्इ बेर देख चुके है। सबरै सुनवे वारे इन्हैं चीनन लगे है लगत है तुम नये आये हो? एर्इ से तुमै नर्इ मालूम।
                इन साब की लुकलुक की बीमारी खौ देख के शहर भर के कवियन ने इनकौ नाव 'लुकलुक कवि धर दओ। अब इन मैं एक विदया तो जन्मजात हती सौ ऊकी दम पै और नैतन की चमचयार्इ करकै इतै उतै की बातें बानकै नेतन के हात पाव जोर कै कैसै भी पैसा ऐठ कै एकाध कवि गोष्ठी अपने घरे करा लर्इ और उन्हीं नेतन खौ शाल श्रीफल सै सम्मान करदओ। शहर भर कै नेतन खौ सम्मान करकै जै अफरै नइयाँ सौ अब उनखै चमचन खौ सोर्इ सम्मान करत जा रये। अब इतै जा सोसवे बारी बात है कि साहितियक गोष्ठी में नेतन कौ सम्मान करवै की का तुक है वे कुन अटल बिहारी है कि कवि  है। जे तो साहित्य कौ 'हींग कौ घगा तो जानत नर्इया और सम्मानित हो रये,जै तो बोर्इ बात हो गर्इ कि मूरखन कै राज मैं
'गधा पजीरी खा रये, लेकिन का करै चमचयार्इ में जो सब तो करनै पडत है। अबे तक तो जा कानात सुनी ती कि 'मुसीबत में गधे को बाप बनालओ जात है पर अब तो पैसन के लाने जी चाये खौ कछु भी बनालो।
अबे तक तो साहित्यकार इन सबसे दूर रततै। साहित्यकारन खौ जो सब नोनो नर्इ लगत है,साहित्यकारन की तौ स्वाभिमान,इज्जत एवं प्रशंसा ही पूंजी रत है। साहित्यकार खौ मतलब होत है जो सबको हित करे वही साहित्यकार होत है जो नर्इ कि केवल अपनौ हित साध लओ। नेतन की चमचयार्इ और लुकलुक करवों अपुन साहित्यकारन कौ नोनो लर्इ लगत है पर का करै जमानौ सोर्इ बदल रओ है। झटटर्इ परसिधी पावे खौ जो शोर्टकट रास्तो है। कछुन ने र्इखौं अपना लओ है।
                अब लुकलुक साब खौ दो तीन साल कवितार्इ करत भये हो गये सो उनने कवियन की कविता पढवे की नकल,मंच की अदाये सीख लर्इ वे अब कवियन में गिने जाने लगे और स्वयं खौ शहर खौ सबसे बड़ो कवि मानन लगे। वे अपने लुकलुकावे को कोनउ मौका हात से नर्इ जान देत है। शहर में जब कभउ कौनउ भी कवि सम्मेलन होत है और ऊ में कोनउ नओ कवि शहर में आवो तो वे एक डायरी लेके ऊखै इतै पौंच कै ऊखों नाव पतौ और मोबाइल नंबर जरूर लिख लेत है और उये जब तक पेरत रत है जब तक कि वौ इने अपने इते एक वेर नर्इ बुला लेत है। दौबारा उतै जावे की नौबत नर्इ आत है। वे जान जात है कि जै कितै बडे वारे है।
                वे अब जब भी मंच पै जात है तो एक दो नर्इ से उनकी लुकलुकी नर्इ जात कम सेे कम छ:सात कविताये तो फटकार आत है संचालक महोदय इनसे बैठवै की बिनती करत-करत थक कै गम्म खाकै बैेठ जात। यदि जै कभऊ कोनउ गोष्ठी कौ सचांलन कर रये तौ फिर उनसे भगवान भी नर्इ बचा सकत है लुकलुक साब कि कछु कवितायें तो गोल्डन जुबली मना चुकी है फिर भी जै बडे शान से ऊ कविता खौ ऐसे सुनात जैसे पैली बेर सुना रये हो।
                उनकी देखादेखी कछु कवियन खौ सोर्इ जा लुकलुक की बीमारी लगगर्इ है। सौ भइया इनर्इ जैसन लुकलुकन की लुकलुकी कम करवै के लाने जौ व्युंग्य लिखौ भओ है। अब का करे जैसै कंपूटर में बाइयरस आ जात है बैसे अब साहित्य में सोर्इ बायरस आन लगे है। यदि इनकौ इलाज नर्इ करो गओ तो जै साहित्य खौ हेंग करके सबरौ साहित्य खौ चाट जेहे। अपुन नै तो एंटीबाइरस अपने एगर धर लओ है ताकि इनके प्रभाव से बचत रये,लेकिन फिर भी कभऊ-कभऊ इनकी चपेट में सोर्इ आ जात है। इनकी मीठी और चापलूसी की बातन में आ जात है। सो भइयाहरौ जा लुकलक की बीमारी भौत खतरनाक है र्इसै अपने खौ बचावे राखने है।
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         राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
        संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
       अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
      शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
       पिन:472001 मोबाइल-9893520965

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हम है जे. एच. डी. .........एक व्यंग्य

  शहर में बढ़ते झोलाछाप डाक्टर को समर्पित यह व्यंग्य- 
      व्यंग्य:- 'हम हैं जे.एच.डी.
        (व्यंग्य-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)
              
                आजकल हर शहर में आपको पी.एच.डी. से दोगुनी संख्या में जे.एच.डी. धारी साहित्यकार जरूर मिल जाएंगे। नगर में कुछ साहित्यकार सेवानिवृतित के बाद अचानक अपने नाम के आगे डा. लिखने लगे तो,मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या शासन ने इन्हें रिटायर्ड  होने पर विदार्इ स्वरूप स्मृति चिन्ह के समान 'डा. की उपाधि दे दी है या फिर इन्होंने अपनी पढ़ार्इ की दूसरी पारी (क्रिकेट की तरह) फिर से एम.ए. (मास्टर डिग्री)के बाद आगे शुरू कर डाक्ट्रेट कर ली है। खोज करने पर पता चला कि उन्होंने पी.एच.डी.नहीं वलिक जे.एच.डी. जरूर की है। नहीं समझे आप जे.एच.डी. का पूरा एवं सही अर्थ होता है 'झोलाछाप है डाक्टर।
                कहीं से बनारस,प्रयाग आदि स्थानों से आयुर्वेद में वैध विशारद,आयुर्वेद रत्न,आर.एम.पी. जैसी कोर्इ उपाधि पैसों की दम पर हासिल कर ली है और फिर बडे़ ही शान से अपने नाम के आगे डाक्टर लिखने लगे। भर्इ ये डा. पहले से लिखते तो भी कुछ हद तक बात ठीक लगती लेकिन अचानक उम्र के इस पड़ाव में सठियाने के बाद लिखने लगे तो बड़ा अजीब लगता है। जबकि हकीकत में ऐसे लोग अपने नाम के साथ वैध,हकीम आदि ही लिख सकते हैं। ना कि डाक्टर। मजे की बात तो यह है कि इन तथाकथिक डाक्टरों को शहर तो क्या गाँव के लोग भी झोलाछाप डाक्टर के असली नाम से ही जानते,मानते और पुकारते हैं।
                कुछ ने तो वाकायदा घर में ही कुछ जड़ी वूटियाँ अपने ड्राइंग रूम में सजाकर 'क्लीनिक खोल लिया है,भले ही ये स्वयं के सर्दी जुखाम तक का इलाज न कर सके और सरकारी अस्पताल में खुद अपना इलाज कराने जाये,ये अन्दर की बात है। लेकिन मरीजों के दमा,कैंसर,एडस से लेकर खतरनाक से खतरनाक बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं। ऐसे जे.एच.डी.एक तीर से दो निशाने साधते हैं। एक तो क्लीनिक खोलकर बैठ गए,कोर्इ न कोर्इ मुर्गा तो पाँच-छ: दिन में फस ही जाता है। नहीं फसा तो कोर्इ यदि भूल भटके से इनके घर किसी अन्य आवश्यक कार्य से पहँुच गया तो समझो गया काम से।
                उसे देखकर यदि  वह मोटा हुआ तो शुगर,बी.पी. या हार्ट आदि की बीमारी बताकर डरा देंगे और कहीं वह दुबला हुआ तो उसे बुखार,पीलिया,या टी.बी. जैसी कोर्इ खतरनाक बीमारी बता कर डरा देते हैं और कहीं धोखे से शरीर में कोर्इ गाँठ या सूजन ही दिखार्इ दी तो वे इसे फौरन कैंसर बताकर उसका बी.पी. तक हार्इ कर देते हैं। यदि वह आदमी इत्तेफाक से सामान्य हुआ तो भी वे उसका चेहरा ऐसे घूरकर देखेगे जैसे कालेज में कोर्इ लड़का किसी खूबसूरत नर्इ लड़की को देखता है। फिर अचानक बहुत गंभीर मुद्रा बनाकर कहने लगेंगे कि तुम्हारा चेहरा कुछ मुरझाया सा लग रहा है, देखो ? गाल कैसे पिचक गये हंैं। तंबाखू,गुटका,शराब आदि का नशा करते हो क्या ? तुरंत बंद कर दो। अब इन्हें कौन समझाये कि आज लगभग अस्सी प्रतिशत बड़े तो क्या बच्चे तक पाउच संस्कृति की चपेट में फंस चुके हैं तो स्वाभाविक है कि वे सज्जन भी खाते हो। उनके हाँ भर कहने की देर होती है, फिर तो उनकी सोर्इ हुर्इ आत्मा जाग जाती है और पूरे चालीस मिनिट तक नान स्टाप 'नशा मुकित की कैेसेड़ चल जाती है और उसका वजन एवं बी.पी. तक नाप देते है और फिर जबरन अपनी सलाह देकर उसे इतना भयभीत कर देते हैं। कि वो बेचारा दोबारा उनके घर तो क्या उस गली से भी कभी गुजरने से तौबा कर लेता है। वैसे इन लोगों के लिए एक कवि ने क्या खूब लिखा है-जबसे ये झोलाछाप डाक्टरी करने लगे, तब से देश के बच्चे अधिक मरने लगे।
असली लाभ उन्हें साहित्यकार होने के कारण अपने नाम के आगे डा. लिखने से असली डा. (विदवान) की श्रेणी में आ जाते हैं अब दूसरे शहर के लोगों को क्या पता कि ये मेटि्रक पास पी.एच.डी. है अथवा जे.एच.डी. है। मजे की बात तो यह है कि शहर के जो असली पी.एच.डी. धारी विदवान साहित्यकार हैं वे भी इन जैसे तथाकथिक स्वयंभू डा. का विरोध तक नहीं करते हैं शायद वे उनके रिश्तेदार हो या बिरादरी के हो या हो सकता है कि वे उनके प्रिय चमचे चेले हो,इसलिए वे चिमाने (मौन) रहते हैं। अभी हाल ही में शहर में एक बड़ा साहितियक आयोजन हुआ उसमें जो आमंत्रण कार्ड छपे उसे यदि एक वार आप भी देख लेते तो आपको भी एक बार हँसी जरूर आती । उसमें असली पी.एच.डी. धारी साहित्यकार है उनके नाम के आगे डा.लिखा था और नाम के अंत में कोष्टक में पी.एच.डी. भी लिखा था और जो जे.एच.डी.टाइप थे उनके नाम के आगे तो सिर्फ डा.लिखा था,किन्तु नाम के बाद कुछ नहीं लिखा गया था,आप स्वयं सोच लें कि बे किसके एवं किस टाइप के डाक्टर हैं। मैंने जब एक असली पी.एच.डी.धारी को वह कार्ड दिखाकर पूँछा कि ऐसा क्यों हैं तो उन्होंने यही कहा कि इसी से तो पढ़ने वालो को पता चल जाता है कि कौन असली और कौन नकली है। मैंने कहा-धन्य हैं आप,क्या नकली के सामने भी डा. लिखना जरूरी था, वे बोले नहीं,यह हमारी मजबूरी थी।
                यदि कोर्इ जे.एच.डी.गाँव में अपना दवाखाना खोलकर किसी तरह अपनी जीविका चलाये तो बात ठीक लगती है किन्तु शहरों(जिलों) में एक साहित्यकार जो विदवान की श्रेणी में आता है,वह अपने नाम कमाने के चक्कर में जबरन नकली डा. लिखता फिरे तो बहुत ही शर्म की बात है। ऐसे लोगों को निराला,पंत,पे्रमचन्द,आदि साहित्यकारों से सीखना चाहिए कि क्या वे डा. थे और गुप्त जी को तो एक विश्वविधालय ने पी.एच.डी.की उपाधि तक दे दी थी किन्तु उन्होंने तो कभी भी अपने नाम के आगे डा. नहीं लिखा। आज इतने वर्ष बाद भी इन सातियकारों का नाम बड़े ही आदर के साथ लिखा व लिया जाता है। उनका स्थान उस समय के असली पी.एच.डी. करने वाले साहित्यकारों से कहीं ऊँचा था।
                यूँ तो नाम कमाने का अपना तरीका होता है। विदवान लोग अपने सदकर्मो से विख्यात होकर नाम कमाते हैं तो वहीं चोर डाकू,चुरकुट एवं बदमाश आदि कुख्यात होकर अपना नाम कमा लेते हैं। धन्य हैं ऐसे डा. जो साहित्य में वायरस की तरह घुसकर साहित्य का 'सा खाकर उसकी हत्या करने में तुले हैं। जाहिर सी बात है कि हम जैसे बिना डाक्टर धारी साहित्य सेवी साहित्यकारों को इस कृत्य पर घोर निंदा करने का मूलभूत अधिकार तो होना ही चाहिए,भले ही ये नहीं सुधरें, किन्तु जब हम सुधरेगे तो जग सुधरेगा।
                काँच कितना ही तरास लिया जाये,लेकिन असली हीरे की बराबरी कभी नहीं कर सकता। जौहरी तो फौरन ही इनकी पहचान कर दूध में मक्खी की तरह निकालकर फेंक देता है। अंत में दो पंकितयाँ इन्हें समर्पित हैं-
                हमाये सामने ही लिखवौ सीखौ और हमर्इ खौ आँखे दिखा रय।
                नकली डाक्टर वनकें हमर्इ खौ वे साहितियक सुर्इ लगा रय।।
                  

                                 राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                                   संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
                                   अध्यक्ष 'म.प्र. लेखक संघ        
                                शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
                                     भारत,पिन:472001 मोबाइल-9893520965